कहानी दो गौरैया का सारांश

कहानी “दो गौरैया” एक छोटे से परिवार की है, जिसमें माँ, पिताजी और एक बच्चा रहते हैं। उनके घर में बहुत सारे पक्षी और जानवर आते-जाते हैं, जिससे पिताजी मजाक में कहते हैं कि उनका घर एक सराय बन गया है, और वे खुद मेहमान जैसे हैं, जबकि असली मालिक ये जानवर और पक्षी हैं। घर के आँगन में एक आम का पेड़ है, जहाँ तोते, कौवे और गौरैया जैसे कई पक्षी आते हैं।

पिताजी हँसते हुए कहते हैं कि दिल्ली आने वाला हर पक्षी उनके घर का पता जानकर चला आता है। इन पक्षियों का शोर इतना तेज होता है कि कानों के पर्दे फटने जैसे लगते हैं, लेकिन लोग इसे गाना कहते हैं।

घर के अंदर भी कई जानवर रहते हैं। चूहे रात भर दौड़ते हैं, जिससे बर्तन गिरते हैं और नींद टूट जाती है। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठता है, शायद उसे सर्दी लगती है, और दूसरा बाथरूम की टंकी पर, शायद उसे गर्मी लगती है। एक बिल्ली भी कभी-कभी दूध पीने आती है। चमगादड़ शाम को कमरों में उड़ते हैं, कबूतर “गुटर गूँ” की आवाज करते हैं, और छिपकलियाँ, बर्रे और चींटियों की फौज भी घर में रहती है। एक दिन दो गौरैया घर में घुस आती हैं और पूरे घर का मुआयना करती हैं, जैसे देख रही हों कि यह रहने लायक है या नहीं। दो दिन बाद वे पंखे के गोले में घोंसला बना लेती हैं और वहाँ रहने लगती हैं। माँ कहती हैं कि अब वे नहीं जाएँगी क्योंकि उन्होंने घोंसला बना लिया है। लेकिन पिताजी को गुस्सा आता है, और वे गौरैयों को भगाने की ठान लेते हैं। माँ मजाक में कहती हैं कि पिताजी चूहों को नहीं भगा पाए, तो गौरैया क्या भगाएँगे। इससे पिताजी और नाराज हो जाते हैं।

पिताजी गौरैयों को भगाने के लिए ताली बजाते हैं, “शू-शू” करते हैं, कूदते हैं, और लाठी लहराते हैं। गौरैया घोंसले से निकलकर कभी पर्दे पर, कभी दरवाजे पर बैठ जाती हैं। माँ हँसती हैं और कहती हैं कि पिताजी का नाचना गौरैयों को पसंद आ रहा है। पिताजी और कोशिश करते हैं, दरवाजे बंद करवाते हैं, लेकिन गौरैया दरवाजों के नीचे की जगह या टूटे रोशनदान से बार-बार अंदर आ जाती हैं। माँ कहती हैं कि अब गौरैयों ने अंडे दे दिए होंगे, इसलिए वे नहीं जाएँगी। पिताजी गुस्से में रोशनदान में कपड़ा ठूंस देते हैं और गौरैयों को फिर भगाते हैं।

हर दिन यही होता है। दिन में गौरैया बाहर निकाल दी जाती हैं, लेकिन रात में वे फिर अंदर आ जाती हैं। पिताजी परेशान होकर कहते हैं कि वे घोंसला तोड़ देंगे। वे स्टूल पर चढ़कर घोंसले के तिनके हटाने लगते हैं। तभी घोंसले से दो नन्हीं गौरैयों की “चीं-चीं” की आवाज आती है। ये नवजात चूजे हैं, जो अपने माँ-बाप को बुला रहे हैं। यह देखकर पिताजी का मन बदल जाता है। वे लाठी नीचे रख देते हैं और चुपचाप बैठ जाते हैं। माँ सभी दरवाजे खोल देती हैं, और गौरैयों के माँ-बाप अंदर आकर अपने बच्चों को खाना खिलाने लगते हैं। अंत में, घर फिर से चहल-पहल से भर जाता है, लेकिन इस बार पिताजी गौरैयों को देखकर मुस्कुराते हैं।

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